Do Aurten By Chitra Panvar
दो औरतें
द्वारा : चित्रा पंवार
प्रकाशक: आपस पब्लिशर्स
शीर्षक:-
मूलतः नारी के मनोभावों पर केन्द्रित रचना संग्रह है, जिसमें नारी मन के भावों के उद्दवेलन को उसकी कामनाओं एवं दमित इक्षाओं को शब्द दिए हैं। नारी विमर्श पर प्रस्तुति है एवं उस तारतम्य में यह शीर्षक सर्वथा उचित है।
कवियत्री :-
चित्रा पंवार जी के यूं तो कई साझा काव्य संग्रह प्रकाशित
हुए किन्तु यह उनका प्रथम एकल प्रकाश्य काव्य
संग्रह है किन्तु विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख , कवितायेँ , कहानियां
इत्यादि बहुलता से निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं तथा संग्रह की कविताओं से उनके
परिपक्व लेखन की खुशबू मिलती है। नारी
स्वातंत्र्य हो अथवा नारी मन की घुटन , पुरुष प्रधान समाज द्वरा थोपी गयी व्यर्थ
वर्जनाओं को तोड़ फेंकनें की दबी हुयी
कामनाएं हों अथवा जीवन का कटु यथार्थ झेलती नारी की व्यथा , विचार बेहद स्पष्ट हैं
एवं अभिव्यक्ति सरल । साथ ही नारी के
प्रति हुए एवं हो रहे अत्याचार को देख मन की कडुवाहट, कहीं कहीं कथन में तल्खी तो
कहीं कटाक्ष भी ले आई है ।
उन्होंने अत्यंत गंभीरता से नारी सम्बंधित हर उस विषय को सम्मुख लाने का सुन्दर प्रयास किया है जो सदियों से दबा छुपा है एवं विरले ही साहित्यकार द्वारा कभी कुरेदा जाता है । उन्होंने समस्याओं की गहराई तक पहुचने का अनुसन्धान किया है वहीं निष्कर्ष भी हैं । स्त्री का बंधे हुए दायरों से बाहर आकर समाज में अपनी प्रतिभा के आधार पर अपने स्वाभिमान के लिए कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा दिखलाई पड़ता है। हालाँकि रोजमर्रा से जुडी बातें ही हैं किन्तु केंद्र में उत्पीडन झेलती नारी की व्यथा , संत्रास। बेमानी वर्जनाओं से आहत जंजीरों को तोड़ने हेतु मन की व्याकुलता एवं अधीरता दिखलाई पड़ती है।
शैली
:-
नारी मन के प्रत्येक भाव
को सशक्त आवाज़ देने हेतु उनकी लेखनी नें कहीं भी किसी अलंकरण अथवा अनचाहे विशेषण
इत्यादि का प्रयोग कर काव्य को तथाकथित सुन्दरता प्रदान करने का प्रयास नहीं किया
है जैसा की आम तौर पर युवा कवियों के प्रथम प्रयास में देखने में आता है। उनके विचारों में मौलिकता , एवं तथ्य परक पैनी
दृष्टि का स्पष्ट आभास होता है। उनकी
अभिव्यक्ति बन्धनों एवं किसी भी प्रकार के आग्रह से मुक्त है। विचारो को संप्रेषित करने हेतु वे स्पष्टता पर
यकीन करती नज़र आती हैं न की वाक्य विन्यास अथवा अलंकरण से काव्य की सुन्दरता पर। जो भी विचार जैसा कवियत्री के ह्रदय में
उत्त्पन्न हुआ है वह मूल रूप में लिपिबद्ध किया गया है। शब्द दिए है विचारों को, और शब्द को मात्र
विचारों को संप्रेषित करने का ही दायित्व दिया है, अतः भाषा सौम्य सरल एवं आम जन
की भाषा है इस कारण से विचार भी सहज ही
ह्रदय गम्य है , विचारों में स्पष्टता ही
एक उत्तम रचना का आधार होती है कहीं कोई विचलन अथवा भटकाव नहीं दृष्टिगत होता।
पुस्तक
से:-
संग्रह की अमूमन हर कविता कुछ न कुछ विशेषता
लिए हुए है किन्तु चंद कविताये जो ध्यान
आकर्षित करती हैं जिनमें कुछ विशेषता का मुझे अहसास हुआ वे यहाँ प्रस्तुत हैं प्रस्तुत
शीर्षक कविता “दो औरतें” 6 विभिन्न आयामों
को देखती दिखलाती हैं, नारी की उन्मुक्त जीवन जीने की चाह को दर्शाती पहली ही रचनामें उनकी कल्पना देखें
”बंद पिंजड़ों से मुक्त चिड़ियों
सी / हवा में हाथ पसार गहरी सांस भर
मुस्कुरा उठती हैं स्वप्न भरी
आँखें /शीशी में वर्षों बंद पड़ी केवड़े सी हंसी
खुलते ही फ़ैल जाती है क्षितिज
तक /चिल्लाते हुए बच्चे दौड़ पड़ते हैं उसी और”
“देखो इन्द्रधनुष निकल आया “ /
घूरती नज़रों से बेपरवाह
वहीं
इसी श्रंखला की एक अन्य कविता में कहती हैं की
ह्रदय की खुलती गिरहों के / झरते भावों मे डूबी हुयी
अंततः बचती हैं शेष / दो
औरतें
औरत
में माँ के रूप को दर्शाती कविता के इन
शब्दों के भाव महसूस करें
“एक स्त्री के यकीन का मूर्त
रूप हो तुम/इसके सिवा और कुछ भी नहीं
माँ के लहू , अस्थि रस दुलार और श्रम / का परिणाम है
तुम्हारा अस्तित्व “
वहीं
पत्नी रूप में स्त्री को कवियत्री कैसे
देखती हैं:
“मगर उसने स्वीकारा बस तुम्हारी होना /यूं तो इतिहास भी रच सकती थी
वह
किन्तु उसने तुम्हारी संतान को
रचा /जीवन साथी से न जाने कब बन गयी जीवन सारथी
और “ सब कुछ साझा कर लेती हैं जब मिल बैठती
हैं दो औरतें “
वहीं
जीवन के भिन्न भिन्न पड़ावों पर नारी को गुमराह करते रिश्ते और अंत समय में उसकी
पीढ़ा दर्शाती ये पंक्तियाँ :
“जीवन की ढलती संध्या में/धीरे धीरे नितांत
अकेली पड़ने लगी मैं
ज़रुरत महसूस की साथी की/ जब माँगा उन
तथाकथित अपनों का समय
एकान्तता के ज़ख्मों से भरी खुरदुरी देह /
तकती रही उनकी राह
की वो कब आयें और स्नेह स्पर्श से सुखा दें
मेरे ज़ख्म”
और
बेटियों के विषय में अत्यंत सुन्दर अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कितना सुन्दर लिखा
है कि :
“जो अधूरी इक्षाएं गाँठ बनकर रह जाती हैं
कहीं भीतर दबी हुयी
वही जन्मती हैं एक दिन
माँ की कोख से बेटी बनकर “
वहीं
बेटी की घर से तुलना करते हुए कहती हैं की
:
घर बेटी सा है जो प्रेम पा खिल उठता है हरसिंगार
की तरह
वर्ना
घुट घुट कर दम तोड़ देता है /देहरी के भीतर
कैद /लड़कियों के ख्वाबों की तरह
वहीं
कविता “बेटी” की ये पंक्तियाँ पढ़ किसे न गर्व होगा अपनी बेटियों पर :
अचानक आकाश के पुरबिया बदन पर /ऊगती लाल
किरणें देख कर मुस्कुरा उठी
सूरज उतर आया मेरे आँगन में /और खेलने लगा बिटिया बनकर
तेरा चाँद सा मुखड़ा देखने के बाद / अब कभी अँधेरे का मुंह नहीं देखना पड़ेगा।
प्रत्येक कविता एक विशिष्ठ भाव लिए है, या तो नारी प्रधान है अथवा नारी केन्द्रित हैं। किसी भी संवेदनशील कवि के मन मस्तिष्क पर समाज एवं सम सामायिक घटनाओं का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है एवं चित्रा जी की चंद कविताओं में वह प्रभाव भी हमें देखने को मिलता है। नारी ह्रदय के समस्त भावों को अपनी कविताओं में समेटने का सफल प्रयास है किसी कविता में उसका माँ का रूप है तो कहीं प्रेयसी और जीवन संगिनी का। कहीं उसका बचपन नज़र आता है तो कहीं प्रौढ़ता या फिर वृद्धावस्था। कहीं उसकी विशालता की उसकी विरक्ति की एवं शांत पृकृति की तुलना पृथ्वी से की है तो कंही उसे तुच्छ सी चींटी के सदृश पाती हैं। विभिन्नता के साथ साथ उनके परिपक्व विचारों की स्पष्ट बेलौस अभिव्यक्ति हैं उनकी समस्त कवितायेँ।
सभी प्रकार की कविताओं में हर तरह के भावों को अभिव्यक्त करने में उनका सूक्ष्म
विचरण एवं अवलोकन उभर कर द्रष्टव्य है।
जीवन के सुख दुःख को देखने का उनका नजरिया दर्शनीय
है कि , जहाँ सुख कभी साथ न आया वहीं दुःख
ने कभी साथ न छोड़ा , कहती हैं की :
मैं सुख से प्रेम करती रही / और दुःख मुझ से
दुनिया से विदाई की बेला में / मैंने
सिरहाने खड़े दुःख को
खींच कर सीने से लगा लिया/अंततः किसी सच्चे
साथी की तरह
मेरे साथ ही मर गया ।
वहीं प्रेम भाव से पगी यह लघु कविता दिल को छू गयी, भाव पर ध्यान दें।
तुम्हारा आना /जैसे मुंडेर पर/फिसलती सर्दी
की धूप
आते ही/लौट जाती है/उलटे पैर
अबकी आना /तो जेठ की दुपहरी /से ठहर जाना
/मेरे पास
और नारी की विवशता देखिये जो वो सदैव डर डर
के जीती है आखिर क्यूँ।
औरत लेकर पैदा नहीं होती माँ के पेट से
एक सोचे समझे षड़यंत्र के तहत
बैठाया जाता है उसके दिमाग में
जीवन मृत्यु से परे / चिर स्थयी भाव बनकर
तो
“घोंसला” के भाव भी जो प्रेम भाव से लबरेज़ हैं ,
ध्यानाकर्षित किये बगैर नहीं रुकते।
वहीं
शीर्षक “कविता” में कहती हैं की कविता कुछ
और नहीं एक दुसरे के दुःख दर्द को बाँट लेने का नाम है तो सामयिक घटना पर उनकी कलम
मौन नहीं है रचना “हाथरस की बेटी” के रूप में।
वहीं पर्यावरण को समर्पित कविता है “आओ वृक्ष लगायें”
और ‘जुर्म’। जहाँ वह कहती हैं की
“कटे हुए वृक्षों को छाती से चिपकाये /
वर्षों रोती है
किसी औरत की कोख उजाड़ देना / उसके साथ किया गया
सबसे बड़ा जुर्म है’।
वहीं
“स्त्री मन”, “अजन्मी कवितायेँ” “सुनो
स्त्री” “दीप का आग्रह”,”नवम्बर और दिवाली” भी सुन्दर एवं भाव प्रधान कृति हैं।
एक बेहद भावयुक्त कविता है “विभाजन का एंटीडॉट”
जो प्रेम का सन्देश देती है एवं विभाजन की भावना मन में रखने वालों से जूझने के
लिए प्रेमियों का आव्हान करती है कि
प्रेमियों आगे आओ
एकमात्र तुम्ही ऐसे प्राणी हो जिन्हें दो
में भी एक दिखायी देता है
नहीं
तो यहाँ हर कोई आमादा है एक को भी हजार भागों में तोड़ने के लिए।
समीक्षात्मक टिप्पणी:-
·
“प्रेम” ,वह विषय है जिस पर किसी
भी युवा कवि की पुस्तक में आम तौर पर सर्वाधिक
रचनाएँ देखने में आती है किन्तु चित्रा जी
ने या तो इस विषय पर बहुत ही कम लिखा या कह सकते हैं की यह खंड अछूता ही रहा है।
·
पुरातन मान्यताओं को , मिथ को
तोड़ने के प्रयास उनकी रचनाओं में बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत किये गए हैं।
·
स्त्री ह्रदय के अन्दर वर्जनाओं को तोड़ने की प्रबल इक्षाएं और
कहीं कहीं समानता पाने की लालसा लेकर ह्रदय में उबलते हुए लावे को चिन्हित करता एक
बेशकीमती दस्तावेज़ है।
·
सुन्दरता से रची गयी तथा नारी
सम्बंधित विभिन्न ज्वलंत समस्याओं पर सवाल
पूछती रचनाएँ लिख कर कवियत्री ने अपनी प्रतिभा का परिचय बखूबी प्रस्तुत कर दिया है.
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